ग़जल

     गजल 212*4

सब ही चुपचाप है बोलता कौन है

आज बाजार में फ़िर बिका कौन है

 

जेब अपनी सभी भर रहे बैठ कर

अब वतन के लिए सोचता कौन है

 

राह से सब गुज़रते न कोई रुका

देख लो ये पड़ा अधमरा कौन है

 

मै तरसती हूँ माँ की उसी डाँट को

माँ के जैसे मुझे टोकता कौन है

 

सारी ही कोशिशें अब तो नाकाम सी

जग में रोके किसी से रुका कोन है

 

अपने अहंकार से हटके सोचा करो

ये खुशी ओर ग़म बाँटता कौन है

 

खोलकर आँख थोड़ा सा देखा करो

मुल्क को हर क़दम लूटता कौन है

 

 

कहते कलियुग मे घनश्याम मिलते नहीँ

बनके मीरा समर्पित भला कौन है

 

हाथ माला है माथे पे चन्दन लगा

आज फ़िर बन गया देवता कौन है

 

सबको मालूम फ़िर भी रहे पूछते

सरहदो पर ये सर काटता कौन है

 

आजतक क्यों किसी ने कबूला नहीँ

कोख मे बेटियाँ मारता कौन है

 

फ़िर से दंगे भड़कने लगे देश में

बैठ कर तालियां पीटता कौन है

 

आज ये फैसला वक्त पर छोड़ दो

बेवफा कौन है बावफा कौन है

 

सब खिलौने है माटी के संसार में

कौन छोटा यहाँ ओर बड़ा कौन है

लगता मेरा ज़माने मे कोई नहीँ

अब तो कम्बोज से रूठता कौन है

सुनीता काम्बोज

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गजल

बेगुनाहों को यहाँ फ़ौरन हिरासत हो गई
दोषियों की चंद लम्हों में ज़मानत हो गई

फूल अपनी डालियों पर अब कहाँ महफूज़ हैं
और यहाँ फ़रियाद करना भी शिकायत हो गई

हर कलम को सच भी लिखने की इजाज़त अब कहाँ
बिन इजाज़त गर लिखा तो ये बग़ावत हो गई

अब सियासत हर जगह दिखने लगी है देश में
जाने इन नेताओ को कैसी बुरी लत हो गई

नफ़रतो के बीज बोते ही रहे हैं जो सदा
प्यार करने पर वो बोले, ये हिमाकत हो गई

अब तो अपने ही उठाते हैं यूँ मुझपर उँगलियाँ
अब तो दीवारों पे भारी अपनी ही छत हो गई

~~~सुनीता काम्बोज